चिंतन के क्षण

Food for Mind and Soul (आध्यात्मिक प्रसाद)........

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ईश्वर सर्वव्यापक है।

Posted On: 1 Jun, 2016 में

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ईश्वर सर्वव्यापक है।

ईश्वर सर्वव्यापक है,बड़ा ही सरल अर्थ है कि ईश्वर सब स्थान में विद्यमान है।समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग मूर्ति पूजा करता है, उनकी मान्यता का आधार भी यही है कि ईश्वर मूर्ति में भी विद्यमान है।सर्वव्यापक पर चर्चा हो रही थी तो एक बंधु ने प्रश्न उठाया कि आप लोग मूर्ति पूजा का विरोध क्यों करते हैं जबकि सर्वव्यापक होने से ईश्वर मूर्ति में भी है, यह तो सच है ही कि मूर्ति में भी ईश्वर विद्यमान है, इस सत्य से कोई भी व्यक्ति जो थोड़ा सा भी आर्य समाज से सम्पर्क रखता है,विरोध नहीं कर सकता और न ही करेगा। विरोध तो इस बात का है कि मूर्ति ईश्वर नहीं है।सुनने में और समझने में बड़ा ही अटपटा सा लगता है कि मूर्ति में ईश्वर है पर मूर्ति ईश्वर नहीं है।इसे स्थूल दृष्टान्त द्वारा समझने में सुविधा होगी -घड़े में जल है,जल घड़ा नहीं है,अलमारी में सामान है, सामान अलमारी नहीं है, तपते लोहे में अग्नि है, अग्नि लोहा नहीं है, ठीक इसी प्रकार मूर्ति में ईश्वर है परन्तु मूर्ति ईश्वर नहीं है।इस प्रकार के संबंधों को व्यापक – व्याप्य संबंध कहा गया है।जगत में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है जिसमें व्यापक- व्याप्य संबंध न हो।ईश्वर व्यापक है और समस्त ब्रह्माण्ड व्याप्य इस प्रकार है जैसे लोटा नदी में डुबा है, जल लोटे के भीतर भी है और बाहर भी है।व्यापक और व्याप्य संबंध को न समझना सबसे बड़ी अज्ञानता है।मूर्ति में ईश्वर की व्यापकता को स्वीकार करते हैं, मिथ्या प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं और मंदिर में उसे प्रतिष्ठित कर देते हैं,मंदिर एक पवित्र स्थान बन जाता है, यहाँ पाप कर्म करने का निषेध है,इस प्रकार सर्वव्यापक ईश्वर से स्थान व काल की दूरी बना लेते हैं।यह अज्ञानता, स्वार्थ और दुष्ट बुद्धि भावना है।इस भावना से दुकानदार व कई अन्य व्यवसायी भी अछूते नहीं है, दुकानों मे भी छोटे-छोटे मंदिर बना रखे हैं और प्रात:जब दुकान खोलते हैं, तब सर्वप्रथम मूर्ति के सामने दीप व अगरबत्ती जलाते हैं, मूर्ति को नमस्कार करके अपना ग्राहकों के साथ झूठ और छल- कपट का व्यापार-धंधा प्रारंभ करते हैं।
समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जो वैदिक शास्त्रों के सूक्ष्म सिद्धांतों से अनभिज्ञ है और अनेक मत, पंथ, सम्प्रदायों की संकुचित सीमाओं में बँधे हुए हैं, ईश्वर के सर्वव्यापक रूप को नहीं समझते हैं।ऐसे अज्ञानी लोगों का ईश्वर क्षीर सागर,चौथे आसमान, और पाँचवे आसमान में रहता है।इन दिनों ब्रह्मकुमारिज का प्रचार ज़ोरों पर है।इनका ईश्वर परम आत्मा है, इस लिए वह परम धाम में रहता है।सर्व व्यापक ईश्वर को एक देशीय बना दिया है।एक बहन जो आजकल पूर्णत: ब्रह्मकुमारिज को समर्पित है, उसके साथ जब सर्व व्यापक की चर्चा चली तो बोली -छी: छी:आप लोग तो ईश्वर को निकृष्ट पदार्थों व निकृष्ट योनिओं में कैसे मान सकते हो।यदि बहन गर्भ का अर्थ जानती तो वेद विरूद्ध बात न करती।पूरे ब्रह्माण्ड में ईश्वर व्यापक है तो पूरा ब्रह्माण्ड ही ईश्वर का गर्भ है और हम सब प्राणी ईश्वर की बनाई हुई प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियाँ हैं।सारा ब्रह्माण्ड उस विराट प्रभु के विराट शरीर में स्थित है और वह प्रभु भी सब के भीतर -बाहर ओत-प्रोत है, समस्त ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी दिखाई या सुनाई दे रहा है, वह सभी परमात्मा से व्याप्त है। वस्तुत: जिस प्रकार प्रत्येक वस्तु आकाश में है और प्रत्येक वस्तु में आकाश है, उसी प्रकार ईश्वर वस्तुओं मे व्याप्त है।ये वैदिक सिद्धांत ब्रह्मकुमारिज के धर्माधिकारी अपने अनुयायियों को बताते ही नहीं हैं, इसके विपरीत इन्हें उल्टे संस्कारों की खूँटी से बाँध देते हैं कि वैदिक सिद्धांतों को ये सुनना ही नहीं चाहते। इनके धर्माधिकारी न तो वेदों को मानते हैं और न ही वेदों के प्रमाण को मानते हैं। इनका अपना मत जो सिद्धांत हीन है, उसका प्रस्तुतीकरण बहुत बढ़िया ढंग से करते हैं। आजकल मार्केटिंग का ज़माना है,मार्केटिंग का गुर है कि कैसे घटिया सामान को सुन्दर पैकिंग द्वारा उपभोक्ता को पहुँचाया जाए, इस प्रकार बढ़िया मार्केटिंग द्वारा सिद्धांत हीन बातें लोगों तक पहुँचाई जा रही हैं।एक बुद्धजीवी ने इनसे शंका का समाधान करना चाहा कि आप लोग वेद व वेद के प्रमाण को नहीं मानते परन्तु जिन पुस्तकों को प्रमाण रूप में मानते हो, उन पुस्तकों में तो लिखा मिलता ही है कि ईश्वर सर्व व्यापक है तो ब्रह्मकुमारिज ने बड़ा ही हास्यास्पद उतर दिया कि इन पुस्तकों के लेखक त्रिकालदर्शी थे वे जानते थे कि मनुष्य कलयुग में बहुत अधिक पाप कर सकता है और इस पाप वृत्ति से बचाने के लिए कह दिया जाता है कि ईश्वर सर्वव्यापक है,वह हमें देख रहा है ताकि भय के कारण पाप कर्म से बचा जा सके। वास्तव में ईश्वर सर्वव्यापक है नहीं ।यहाँ कितना बड़ा विरोधाभास है कि सत्य की परिभाषा ही बदल डाली।सत्य तो सार्वकालिक होता है।सत्य का स्वरूप कभी भी नहीं बदलता है।मन से जैसा विचार किया जाए,वाणी से वैसा ही बोला जाए और वैसा ही क्रिया में लाया जाए,वही सत्य होता है।
आज सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि लोग ईश्वर को सर्वव्यापक स्वीकार नहीं करते हैं,कारण कि ईश्वर इन्द्रिय गोचर नहीं है, हम उसे नहीं देख पाते इस लिए ईश्वर की सत्ता में प्राय: भ्रम व संशय उठाते रहते हैं।ऋषि दयानंद सरस्वती जी सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक है क्योंकि जो एक देश में रहता तो ईश्वर सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वनियन्ता,सब का स्रष्टा, सबका धर्ता और प्रलयकर्ता नहीं हो सकता।क्योंकि अप्राप्त देश मे कर्ता की क्रिया का होना असमंभव है।जहाँ -जहाँ क्रिया होगी वहाँ – वहाँ कर्ता अवश्य ही होगा,चूँकि क्रिया सर्वत्र हो रही है अत: ईश्वर सर्वत्र व्यापक है। ऋषि पतंजलि जी योग दर्शन में समाधियोग की चर्चा करते हैं, यह योग की बहुत ही ऊँची अवस्था है।इस अवस्था में ही योगी ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।ईश्वर को सर्वव्यापक मान कर ही समाधियोग की सिद्धि हो सकती है अन्यथा नहीं हो सकती है।योगी मानता है कि यह सब ब्रह्म ही है,मन से सभी दिशाओं की परिक्रमा करता है तो पाता है कि आगे ब्रह्म है, पीछे ब्रह्म है,दाएँ ,बाएँ ,ऊपर, नीचे सर्वत्र ब्रह्म ही फैला हुआ है।ज्ञानी को सर्वत्र ब्रह्म ही ब्रह्म दिखाई देता है तो बोल उठता है “जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है।”
हमारे किए गए कर्मों का फल जो ठीक-ठीक देता है, वह न्यायकारी होता है। जो कर्ता को उसके कर्मों के अनुसार न अधिक, न न्यून फल मिलता है उसे न्याय कहते हैं। सर्वव्यापक ईश्वर ही न्यायकारी हो सकता है क्योंकि वह हम जीवों के कर्मों का दृष्टा है।ईश्वर हमारे मन, वाणी व शरीर से किए जा रहे कर्मों को निरन्तर देख, सुन व जान रहा है। सर्वव्यापक ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखने से ही व्यक्ति अपराधों से बचा रहता है।ज़रा विचार करके देखे कि “ईश्वर बड़ा या सी.सी.वी कैमरा” आज कल लिखा होता है,”आप कैमरे की नज़र में है “यह पढ़ते ही व्यक्ति सतर्क हो जाता है, और चोरी व अन्य किसी भी प्रकार के दुष्कर्म को करने से बच जाता है। जबकि ये मनुष्य द्वारा बनाया एक उपकरण मात्र है।इस उपकरण का भी कई बार दुरुपयोग किया जाता है,अपराधी पकड़ में नहीं आते।हम भूल जाते है कि हम हर समय ईश्वर की नज़र में हैं, और ईश्वरकी नज़र न ख़राब होती है, न बंद होती है, न किसी के नियंत्रण मे होती है, तात्पर्य कि बचने का कोई तरीका नहीं है।ध्यान रहे हम सदैव सर्वत्र ईश्वर की नज़र में है ।
आज पूरा विश्व अशान्त है।चारों ओर भय का वातावरण बना हुआ है। सभी असुरक्षित भावना की चपेट में हैं।समाचार पत्र मुख्य पृष्ठ से अन्तिम पृष्ठ तक असामाजिक घटनाओं के समाचार से भरा रहता है।दूरदर्शन के सभी चैनलों पर भी ऐसे ही घृणित कुकर्मों की सूचि प्रसारित हो रही होती है।ज़रा ध्यान पूर्वक सोचें तो इस सब का कारण समझ में आ सकता है क्योंकि कोई भी कार्य बिना कारण नहीं होता है।ईश्वर के सच्चे स्वरूप को ही न जानना और न ही मानना मूल कारण है।यदि जीवन में सच्चा सुख व शान्ति चाहिए तो मन व बुद्धि मे हर क्षण अनुभूति बना लें कि ईश्वर सर्वव्यापक है,हम सभी जीवों के कर्मों का दृष्टा है।किए गए कर्मों के अनुरूप ही ईश्वर हमें सुख-दु:ख देता है।इस प्रकार की भावना बन जाने पर व्यक्ति पाप कर्मों से बचा रहता है।ईश्वर से प्रार्थना है- “धियो योन: प्रचोदयात् “- हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कर्मों की ओर प्रेरित करो।
राज कुकरेजा/ करनाल

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
June 2, 2016

ईश्वर सर्वव्यापक है उसके साथ ही सारे भूतों का समूह भी श्रष्टि की उत्पत्ति के साथ उत्पन्न होते हैं और श्रष्टि के नाश यानि प्रलय के साथ समाप्त हो जाते  हैं ।श्रष्टि है तो सब भूत यानि काम क्रोध मद लोभ मोह आदि आदि भी रहेंगे ।ओम शांति शांति कारक 

rajkukreja के द्वारा
June 3, 2016

ईश्वर कभी उत्पन्न नहीं होता है।प्रकृति उपादान कारण से सृष्टि की रचना करता है।

sadguruji के द्वारा
June 5, 2016

आदरणीया राज कुकरेजा जी ! तार्किक और विचारणीय लेख के लिए सादर अभिनन्दन ! सूर्य एक जगह पर है, किन्तु उसकी सत्ता या रोशनी सर्वत्र फैली हुई है ! भक्तों के तर्क के अनुसार भगवान का भी एक धाम है और उनकी भगवत्ता सृष्टि में सर्वत्र फैली हुई है ! शरीर में भगवान हैं, किन्तु शरीर भगवान नहीं है ! लेकिन भगवद प्राप्ति का एक माध्यम तो है ! मूर्ति भगवान नहीं, लेकिन भगवान के भीतर तो है ! वो भी तो भगवान के प्राकट्य का या अनुभव का एक माध्यम बन सकती है ! मुझे लगता है कि आर्य समाजी लोग ज्ञानार्जन अधिक करते हैं और साधना कम ! जबकि मोक्ष के लिए इसके ठीक विपरीत चलना चाहिए ! आदमी बिना किसी सोच-विचार के जितनी देर भी मौन रह ले, वो सर्वोच्च साधना है, शेष सब महज तार्किक और ज्ञान होने पर निरर्थक है ! सादर आभार !

Shobha के द्वारा
June 8, 2016

आदरणीय राजकुमारी जी हम तो मथुरावासी हैं विरोध तो इस बात का है कि मूर्ति ईश्वर नहीं है।सुनने में और समझने में बड़ा ही अटपटा सा लगता है कि मूर्ति में ईश्वर है पर मूर्ति ईश्वर नहीं है।आप मूर्ति में ईशवर है या नहीं बात करते हैं हमें तो उसमें कान्हा के दर्शन होते हैं बाके बिहारी जी के मंदिर जा कर जब हम दर्शन करते हैं हमारी आँखे धन्य हो जाती हैं हमें कन्हैया में लल्ला के दर्शन होते हैं मेरी सारी शिक्षा उस दर्शन के आगे बेकार है भावना की बात हैं ‘ हर मथुरा वासी चाहता है ‘ यमुना का वंशीवट हो मोरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकलें ‘| हम जब बांके बिहारी के आगे दण्डवत करते हैं हमारे सब दुःख उनके हो जाते हैं बड़ी बातें समझने की हममें बुद्धि नहीं है

sadguruji के द्वारा
June 8, 2016

आदरणीया राज कुकरेजा जी ! ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बधाई ! भगवान के एक देशी और सर्वत्र विद्यमान होने का एक व्यावहारिक उदाहरण और देना चाहूंगा ! आत्मा परमात्मा का अंश है ! वो देह में एक देशी यानि दोनों भवों के मध्य तीसरे नेत्र पर उसका केंद्र होने के वावजूद भी वो देह में सर्वत्र विद्यमान है ! अपने भीतर झाँक इस सत्य को महसूस किया जा सकता है ! परमात्मा की भी वस्तुतः यही स्थिति है ! सादर आभार !

rajkukreja के द्वारा
June 12, 2016

श्रीमती शोभा जी नमस्ते,हम भी श्री कृष्ण जी को एक महान योगी के रूप में देखते हैं।श्री कृष्णजी स्वयं जिस निराकार, सर्वव्यापक ईश्वर की उपासना करते थे, उसी उपासनापद्धति को ऋषि दयानंद सरस्वती जी भी स्वीकार करते हैं।कृपया सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय विशेषता सप्तम समुल्लास का अवश्य ही करें।ईश्वर के प्रति सभी प्रकार के संशय व भ्रम दूर हो जाएँगे ।आपने मेरे लेख के प्रति अपनि प्रतिक्रिया व्यक्त की, आपका धन्यवाद।

rajkukreja के द्वारा
June 12, 2016

आदरणीय सदगुरु जी नमस्ते,आपने मेरे लेख ईश्वर सर्वव्यापक है की प्रतिक्रिया व्यक्त की है ,आपका धन्यवाद।ईश्वर की सत्ता की तुलना सूर्य से की है और जो सूर्य का उदाहरण प्रस्तुत किया है,वह आपके पक्ष की पुष्टि नहीं करता है क्योंकि सूर्य की रोशनी सर्वत्र नहीं फैलती,सूर्य के सामने जो भूमण्डल का भाग आता है,वहाँ ही प्रकाश होता है। भूमण्डल के पिछले भाग में तो अंधकार ही होता है।

rajkukreja के द्वारा
June 12, 2016

आदरणीय सदगुरु जी नमस्ते,आपने best blogger के लिए बधाई संदेश दिया है,धन्यवाद।आपसे अनुरोध व प्रार्थना है कि ईश्वर के सच्चे स्वरूप को जानने के लिए ऋषि दयानंद सरस्वती जी के सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास का स्वाध्याय अवश्य ही करें।वेदों के आधार पर ईश्वर विषय की चर्चा है और सत्यार्थ प्रकाश के स्वाध्याय से ही ईश्वर के प्रति सभी प्रकार के संशय व भ्रम दूर हो जाएँगे ।

jlsingh के द्वारा
June 12, 2016

आदरणीया राज कुकरेजा जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई! वैसे तो हम सभी थोड़े थोड़े अंध विश्वासी होते ही हैं, क्योंकि हमें संस्कार में वही सिखलाया गया और उसी के कारण हम सब ईश्वर नाम की सत्ता या उनके डर से थोड़ा संयमित रहने का प्रयास मात्र करते हैं. पर जो ईश्वर की सत्ता को दिखलावे के लिए /दूसरों को डरने के रूप में इस्तेमाल करते हैं और खुद उसे नहीं मानते उन्हें ईश्वर क्यों नहीं दण्ड देते हैं. आजकल बहुत सारे तथाकथित संत लोग गम्भीर कुकृत्य के आरोप में जेलों में बंद हैं, क्या उन्हें कभी ईश्वर का डर नहीं लगा? ईश्वर एक है सर्वव्यापी है, वेद में वर्णित हैं, फिर भी अलग अलग धर्म, सम्प्रदाय क्यों ? हिन्दू धर्म में ही अलग अलग पूजा पद्धति, अलग अलग मंदिर क्यों, अनेकों देवी देवता क्यों? क्यों हम एक ही ब्रह्म की उपासना नहीं करते? जितने भी महात्मा, ज्ञानी पुरुष हैं सभी अपनी बात को ही सही मानने/मनवाने पर आग्रही क्यों होते हैं? जैसे भगवान कृष्ण या राम ने अपने-अपने समय में अवतार लेकर प्राणियों और धर्म की रक्षा की, आज क्या वैसी स्थिति अभी नहीं आयी है? आशा है, आप मेरी आशंका का समाधान करने का प्रयास करेंगी. सादर!

rajkukreja के द्वारा
June 13, 2016

महोदय जी नमस्ते,बधाई संदेश के लिए हार्दिक धन्यवाद।ईश्वर सर्वव्यापक है।आपने कुछ संशय उठाए हैं व कुछ जानने की जिज्ञासा भी प्रकट की है जोकि स्वाभाविक ही है।कुकृत्यों के करने वाले लोग, ईश्वर की न्याय व्यवस्था में अवश्य ही दण्ड के पात्र बन रहे हैं।ईश्वर सर्वव्यापक और न्यायकारी भी है।व्यक्तिगत तौर से मुझे सत्यार्थ प्रकाश के स्वाध्याय से अत्यंत ही लाभ हुआ है।कृपया आप भी इसका स्वाध्याय करें तो निश्चय आप की सभी शंकाओं का समाधान हो जाएगा और आपके द्वारा पूछे प्रश्नों के संतुष्टिदायक उत्तर भी मिल जाएँगे ।


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