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विश्व गुरू देव दयानंद (शिवरात्रि बोधोत्सव)

Posted On: 13 Feb, 2017 में

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शिवरात्रि (ऋषि बोधोत्सव)
विश्व गुरू देव दयानंद
दयानंद सरस्वती जी को विश्व गुरु की उपाधि से विभूषित करना अतिशयोक्ति नहीं है, न ही उनके साथ पक्षपात और न ही अन्य गुरूओं के प्रति उपेक्षा की भावना रखना है। अन्य सभी गुरुओं ने अपने स्तर पर अपनी ही सीमा में और अपने ही क्षेत्र में और स्वयं को अग्रणी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है और धर्म के सच्चे स्वरूप को विकृत करके अनेक मत मतान्तरों को जन्म दिया है और विश्व की पूरी मानव जाति को खण्डित कर दिया है। विश्व में अशांति का मूल कारण यही मत हैं। सभी मतों के अनुयायियों में परस्पर अपने -अपने मत को दूसरे के मत से श्रेष्ठ सिद्ध करने में होड़ लगी हुई है। एक दूसरे के मत वालों को नीचा दिखाने के लिए स्वयं नीच से नीच कर्म करने से नहीं चूकते। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। लोग धर्म और संप्रदाय के अंतर को नहीं समझ पाते। ॠषि दयानंद सरस्वती की विशेष देन है कि उन्होंने मत और संप्रदाय के अंतर को समझा और समझाया कि धर्म सबका एक ही है। संप्रदाय, स्वार्थी व्यक्ति की अपने ही मन की उपज है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी चाहते तो किसी भी बड़े मंदिर के महंत, मठाधीश बन कर अन्य पण्डों की तरह आराम से बैठे-बैठे खाते-पीते मौज उड़ाते, लेकिन उन्होंने ऐसा न करके अपना जीवन समाज और सनातन धर्म के लिए दान कर दिया। एकलव्य ने तो सिर्फ एक अंगूठा दिया था गुरु दक्षिणा में लेकिन दयानंद ने तो पूरा जीवन ही दे दिया गुरू दक्षिणा में। ऐसे में ॠषि दयानंद सरस्वती जी के जीवन पर दृष्टिपात करें तो इस गुरु का पूरा जीवन ही विश्व की पूरी मानव जाति को ही समर्पित है। वेद में पूरी आस्था, और वेद में प्रमाण को सर्वोपरि व्यवस्था से देखना, स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज की सबसे बड़ी विशेषता है और यह विशेषता उनको सारे ऋषियों, दार्शनिकों, सन्यासियों, संतो और ज्ञानियों से बिल्कुल अलग दिखाती है। ॠषि दयानंद ने उदघोष दिया कि “वेदों की ओर लौटो”। उनका मानना था कि जब तक विश्व मानव जाति का एक धर्म, एक धर्म ग्रंथ, एक ही पूजा पद्धति, एक भाषा और एक राष्ट्र भावना नहीं होगी, तब तक मनुष्य मात्र का कल्याण नहीं हो सकता। वेद के आधार पर विश्व के कल्याण की योजना बनाई जा सकती है, क्योंकि वेद में ईश्वर द्वारा दिया गया मानव मात्र की भलाई का संदेश है। उसमें प्रान्तवाद, जातिवाद, भाषावाद और सम्प्रदायवाद जैसी संकीर्ण भावना का लेशमात्र भी उल्लेख नहीं है। ॠषि दयानंद जी ने यथार्थ दर्शन दिया है। ईश्वर की वास्तविकता (सत्ता)का दर्शन दिया। संक्षेप में कहें तो मनुष्य की सत्ता की सच्चाई तथा उस विश्व की वास्तविकता का दर्शन दिया जिसमेँ मनुष्य को रहना है। ॠषि का दर्शन कार्यों का दर्शन है न कि निठल्ले चिन्तन का। उन्होंने धर्म को ही कर्म स्वीकार किया है।
ॠषि दयानंद सरस्वती जी आध्यात्मिक क्षेत्र में ऐसे ही अकस्मात नहीं उतरे थे। उन्होंने आध्यात्मिक अग्नि में स्वयं को खूब तपाया। स्वामी विरजानन्द जी के सान्निध्य में ज्ञान अर्जित किया।कहने को तो स्वामी विरजानन्द जी प्रज्ञा चक्षु थे परंतु थे व्याकरण के सूर्य। दयानंद जैसे शिष्य को उन्होंने प्रकाशित किया, फल स्वरूप थोड़े ही काल में ॠषि दयानंद ने अनेकों आर्ष ग्रन्थों का स्वाध्याय करके स्वयं को परिपक्व बनाने के पश्चात आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रवेश किया।ऋषि दयानंद जी प्रकाश के स्तंभ हैं।प्रकाश का स्तंभ स्वयं प्रकाशित होने के साथ-साथ अन्यों को भी प्रकाशित करता है।ऋषि का उदेश्य केवल एक ही था कि विखंडित मानव जाति को, धर्म जो सभी का एक ही है जिसको भूला दिया गया था, उस की पुन:स्थापना करना।पुन: स्थापना के लिए ही बार-बार उदघोष दिया कि “ वेदों की ओर लौटो “।
वैदिक धर्म में महा पुरूष उसी को माना गया है जो ईश्वर के नियमों और आज्ञाओं का पालन करता है।इस परिभाषा के अनुरूप ऋषि खरे उतरते हैं। इस युग में ॠषि दयानंद सरस्वती जी ने क्रांति का शंखनाद फूंकते हुए मुख्य रूप से धर्म के विषय यही तो कहा कि सर्वतंत्र सिद्धांत अर्थात सामान्य सार्वजनिक धर्म, जिसको सदा से सब मानते आए हैं और मानेंगे भी, इसलिए उसको सनातन नित्य धर्म कहते हैं जिस का विरोधी कोई भी न हो सके। महर्षि के विषय में अनेकों ने अपने सर्वोत्कृष्ट विचार व्यक्त किए हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती जी कितने बड़े विद्या के भण्डार थे, यह जानकारी उनके ग्रंथ, वेद भाष्य, सत्यार्थप्रकाश, पत्र व्यवहार, उनका जीवन चरित्र ये सब दे रहे हैं कि वे निर्भय, न्यायकर्ता, सर्व प्राणी के हितैषी, सम दृष्टि और पक्ष पात रहित उनका जीवन था। महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने समस्त संसार के उपकार के लिए आर्य समाज नामक संस्था स्थापित की और आर्य समाज के नियम बनाए जो किसी व्यक्ति, जाति और देश के लिए नहीं अपितु सार्वजनिक, सार्वकालिक हैँ और सार्वभौमिक हैं। आर्य समाज जीवन जीने की एक अदभुत शैली है जो ऋषि दयानन्द जी के तप से हमें मिली है. उन्होंने आर्य समाज को मुख्य-मुख्य दस नियम व वेदों के आधार पर कुछ सिद्धांत दिए हैं जिन का वे स्वयं भी पालन करते थे. दस नियमों में प्रथम दो तो ईश्वर के स्वरूप को बताते हैं. परम धर्म वेद का पढ़ना-पढाना, सुनना-सुनाना है. वे केवल वेद को पढ़ना और सुनना ही धर्म नहीं मानते अपितु उस का पढ़ाना और सुनाना भी धर्म है, क्योंकि जब तक पढ़ी और सुनी विद्या को व्यवहार में नहीं लाया जाता, मन पर संस्कार दृढ़ नहीं बनते और इसके विपरीत पढ़ा, सुना और विचारा सब व्यर्थ सा हो जाता है. सबको सत्य का ग्रहण करने व असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए. सब कामों का आधार सत्य हो, समाज का मुख्य उद्देश्य शरीरिक, आत्मिक व सामाजिक उन्नति करना है, सबके साथ प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए, अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि करनी चाहिए, अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहकर सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्व हितकारी नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतंत्र रहें.
ऋषि ने वेद और सब सत्य शास्त्र जिन का आधार वेद ही है से प्रमाणित किया है कि ईश्वर एक है, ईश्वर-जीव-प्रकति तीनों आनादि पदार्थ हैं, पुनर्जन्म होता है, ईश्वर न्यायकारी है उस की कर्मफल व्यवस्था में किये हुए पाप कर्मो का फल अवश्य मिलता है अर्थात क्षमा मांगने से फल नहीं मिलता ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
महर्षि के विषय में अनेकों ने अपने सर्वोत्कृष्ट विचार व्यक्त किए हैं। महान कवि सूर्य कान्त त्रिपाठी जी ॠषि दयानंद सरस्वती जी के विषय में लिखते हैं कि महर्षि दयानंद सरस्वती से बढ़कर भी मनुष्य होता है, इसका प्रमाण प्राप्त नहीं हो सकता। आर्य समाज की प्रतिष्ठा भारतीयों में एक नए जीवन की प्रतिष्ठा है।आर्य समाज की प्रगति एक दिव्य शक्ति की स्फूर्ति है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी आर्य समाज के माध्यम से केवल भारत का ही नहीं अपितु पूरे विश्व का कल्याण चाहते थे। दयानंद सरस्वती जी की शिक्षा जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति के भेदों से ऊपर उठकर जन सामान्य को एक परिपूर्ण मानव बना देने में सक्षम है। जीवन और जगत के प्रति सोच अधिकाधिक वैज्ञानिक होती चली जाती है। सृष्टिक्रम के विरुद्ध भ्रम का निवारण स्वतः ही हो जाता है। जो युक्ति, तर्क और विवेक की कसौटी पर खरी उतरती है वही सत्य होती है। मिथ्या चमत्कारों और ऐसे चमत्कार दिखाने वाले ढोंगी बाबाओं के चक्कर में कभी नहीं आते। वैदिक सतग्रंथो के अध्ययन में रूचि बढ़ती है, फलस्वरूप वैदिक क्षितिज विस्तृत होता है और विश्व बंधुता बढ़ती है।
ॠषि दयानंद जी ने क्या किया और विश्व को क्या-क्या दिया, इस विषय को शब्दों में समेटना असंभव यदि नहीं है तो इतना सरल भी नहीं है। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री काशीप्रसाद जयसवाल की ये पंक्तियाँ ॠषि दयानंद सरस्वती जी के इतिहास का निचोड़ हैँ कि उन्नीसवीं शताब्दी में धराधाम पर एकेश्वरवाद का ऐसा महाप्रतापी सन्देशवाहक गुरू कोई नहीँ हुआ, मानवीय एकता का संदेशवाहक तथा आध्यात्मक जगत्‌ मेँ पूंजीवाद के विरूद्ध लड़ने वाला कोई ऐसा धर्मयोद्धा नहीँ हुआ जैसा कि ॠषि दयानंद जी थे। ऐसे विश्व गुरू देव दयानंद जी को कोटिश: प्रणाम व नमन करते हुए हम गर्वित होते हैं।
राज कुकरेजा /करनाल
Twitter @Rajkukreja 16

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