चिंतन के क्षण

Food for Mind and Soul (आध्यात्मिक प्रसाद)........

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माँ

Posted On 12 May, 2017 में

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माँ (Mother Day)
पूजनीय भाभी जी को समर्पित।
माँ की अथाह विशालता को एक दिन में कैसे और क्यों बांध सकते हैं? ‘आज माँ का दिन है’ (Today is Mother day), कौन बता सकता है कि कौन सा दिन मां के बिना है? सृष्टि की सर्वोत्तम रचना माँ ही है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं है। ईश्वर स्वयं निराकार है।सृष्टि में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए उसने माँ की रचना साकार रूप में की है। इसलिए माँ को ईश्वर का साक्षात रूप भी कहा जाता है। माता-पिता मूर्तिमान देव हैं, जिनके संग से मनुष्य देह की उत्पत्ति, पालन, सत्य शिक्षा, विद्या, और सत्योपदेश की प्राप्ति होती है। माँ की महिमा को शब्दों मे मण्डित नहीं किया जा सकता। माँ ही बालक की प्रथम गुरु है, इसलिए कहा भी गया है कि माता प्रथम पूज्यनीय देवता है।
माता ममता की मूरत है, प्रेम का प्रतीक है, धैर्य की मिसाल है, दया की देवी है, सेवा की मूरत है, परोपकार की प्रतिमा है, सौंदर्य का स्रोत भी। माँ के आँचल में सुख और शांति का अथाह सागर है। ईश्वर की तरह बेमिसाल है। इस प्रकार की शब्दावली और अनेक विशेषणों से माँ के स्वरूप को विभूषित करने की शैली प्राय:काव्य तथा साहित्य में पढ़ने को मिलती रहती है।
अपने बच्चों की सुख सुविधा के लिए स्वयं दुःख झेल सकती है परन्तु अपने बच्चों पर आँच नहीं आने देती। माँ स्वयं जागती रहती है, लेकिन बच्चों को सुलाती है।अपने बच्चों के सुधार के लिए दण्ड अवश्य देती है, परन्तु उसमें भी दया और करुणा छिपी होती है। बचपन में माँ के प्रति हमारी सोच बचकानी होती है।माँ का लाड़ दुलार तो मिलता रहे, यह भावना तो बनी रहती है, माँ जब हमारी ही ग़लतियों के लिए ताड़ना करती है तो, माँ की यह कठोरता शायद किसी भी बालक को अच्छी नहीं लगती है, उस समय माँ सबसे बड़ी दुश्मन लगती है। जब परिपक्वता आती है तो माँ के प्रति श्रद्धा भाव से नत मस्तक हो जाते हैं । जब स्वयं माँ बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है तो बचपन की नादान सोच हास्यास्पद लगने लगती है और अपने कर्तव्य का बोध होने लगता है कि प्रत्येक माँ अपने बच्चों की स्वछंदता और उच्छृंखलता पर अंकुश लगाना अपना कर्तव्य समझती है।
मनुष्य की यह प्रवृति है कि जो वस्तु सहज और सुलभ में उपलब्ध होती है, उस का मूल्याँकन नहीं करते, और जब मूल्याँकन करते हैं तब काफ़ी देर हो चुकी होती है। मेरा अपनी ममतामयी माँ के प्रति भी कुछ इस प्रकार का अनुभव रहा। आज मेरी माँ हमारे मध्य नहीं है। उनके जीवन काल में कभी नहीं विचारा था कि उनके संसार से प्रयाण को सहन करना मेरे लिए इतना अस्वाभाविक होगा। अब उनके स्थान में आई शून्यता को उनकी स्मृति अवशेषों से भर पाना सहज नहीं है। मेरे जीवन क्षेत्र में, मेरी हर मुश्किल की घड़ी में माँ की दुआओं के प्रभाव की झलक मुझे अनायास ही माँ की स्मृतियों में गोता लगाने को विवश कर देती हैं। लगने लगता है कि माँ एक ऐसी बैंक है, जहाँ हम हर भावना और दु:ख जमा कर सकते हैं।माँ एक ऐसा वट वृक्ष है जो अपनी शीतल छाया से अपने बच्चों को ताप नहीं लगने देती।
संतान को माँ की भावनाओं का आदर करना प्रथम व प्रधान कर्म समझना चाहिए।जीवित माँ की जितनी भी सेवा की जाए, उसका ॠण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता है। ॠषिओं का भी यही मानना है कि जीवन के प्रत्येक क्षण और श्वास का समर्पण करके भी हम मातृ-पितृ के ॠण से उऋण नहीं हो सकते। संतानों को तन, मन, धन से सेवा कर के सदा माँ को खुश रखना चाहिए। सौभाग्यशाली संतान माँ की सेवा करने को अपना परम कर्तव्य समझती है और ऐसी संतान को ही माँ के आशीर्वादों का भंडार प्राप्त होता है। घर में सदा सुख शान्ति का वातावरण बना रहता है।
हम सब की दो माँ हैं। लौकिक जगत में जन्मदात्री, ईश्वर का साकार दृश्य रूप माँ और आध्यात्मिक जगत में जगत जननी माँ ईश्वर का निराकार अदृश्य रूप। बड़ी विडम्बना की बात है कि दोनों के अंतर को अपनी बुद्धि में नहीं बैठा पा रहे हैं।और विषम परिस्थिति उपस्थित हो रही है कि कुछ लोग जीवित की तो उपेक्षा करके मिट्टी की माता की मूर्ति की पूजा पद्धति की ओर दौड़ रहे हैं।पिछले कुछ समय से विशेष करके उतर भारत में माता के जागरण का प्रचलन चल पड़ा है। स्वयं ही बुद्धिजीवी लोग निर्णय करें कि क्या पत्थर की मूर्ति में जगत जननी माँ के सभी गुण हैं? जगत जननी माँ तो सर्वज्ञ, सर्वव्यापकहै, कण कण में समाई हुई है। भला उसकी मूर्ति कैसे बन सकती है? उसकी सूरत कैसे हो सकती है? क्या मनुष्य इतना ज्ञानी ध्यानी हो गया है कि निराकार को आकार दे सकता है? कभी भी संभव नहीं है। कुछ स्वार्थी लोग अपनी जीविका हेतु विपर्यय अर्थात विपरीत बुद्धि द्वारा माता जागरण करवाने से घर में सुख-सम्पति-शान्ति मिलती है,ऐसा प्रचार करने लगे हैं। ऐसे स्वार्थी लोगों के बहकाने से रात्रि को माता जागरण की भेड़ चाल चल पड़ी है।ये मंदबुद्धि नहीं समझते कि दुनिया में सबसे तेज़ रफ़्तार माँ की दुआओं की होती है—-जो जुबां तक पहुँचने से पहले ईश्वर तक पहुँच जाती है। मैं व्यक्तिगत अधिकार पूर्वक इस तथ्य की पुष्टि कर सकती हूँ कि ऐसे कितने ही परिवार हैँ जहाँ बहु बेटे अपनी निज जननी की तो अवहेलना कर रहे हैं, दूसरी ओर माता का जागरण करवाते हैं, धन का दुरुपयोग करते हैं।समाज में धार्मिक मुखौटा लगा लेते हैं और जन्म दात्री अपनी ही संतान से उपेक्षित जीवन जी रही है या फिर वृद्ध आश्रम में निराश-हताश जीवन की संध्या शोचनीय अवस्था में अपनी अंतिम घड़ी की प्रतीक्षा कर रही है।
रात्रि में माता के जागरण से सुख-सम्पत्ति-शांति मिलती है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि रात्रि सोने के लिए होती है, दिनभर की थकान को दूर करने के लिए होती है और दिन काम करने के लिए होता है, पुरुषार्थ के लिए होता है, यही प्रकृति का नियम है। प्रकृति नियम तोड़ने से प्रकृति दण्ड अवश्य ही देती है।
इस बिंदू पर तनिक विचार करने से हम स्वयं अनुभव करते हैं कि हमें अपने जीवन काल में मिलने को तो हजारों लोग मिल ही जाते हैं परन्तु हमारी हजारों गलतियों को सुधारने और माफ करने वाली माँ नहीं मिलती है। माँ के आशीर्वाद और प्यार में कभी भी पतझड़ नहीं आता। संसार में केवल माँ ही ऐसी कृति है जिस का प्यार बिना स्वार्थ के होता है।
मातृ दिवस (Mother day) के उपलक्ष में सोशल मीडिया पर माँ के प्रति इतने संवेदन शील, माँ की भक्ति व श्रद्धा से परिपूर्ण संदेशों का जाल सा बिछा होता है। सभी के हृदयों में माँ का वात्सल्य हिलोरें मार रहा होता है।आश्चर्य भी होता है कि इतनी सारी मातृ भक्ति है तो क्यों देश में वृद्ध आश्रमों का जाल बिछाया जा रहा है? मेरी इस शंका का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है कि देश में बच्चों के पास ज्ञान की किसी भी प्रकार की कमी नहीं है, बस एक यही प्रोब्लम है कि ज्ञान तो बहुत इकट्ठा कर रहे हैं पर जीवन में उतारने का समय किसी के पास नहीं है। बस सब फार्वर्ड करने में लगे रहते हैं।
संक्षेप में माँ का स्वरूप किसी ने अति सुंदर शब्दों में किया है—–
Mother?
Someone who sees the best in you even when you drive her crazy.
Mothers are the magicians, they turn pain into hope.
Hardships into lessons and tears into laughter. Mother is she who can take a place of all others, But whose place no one else can take.
ईश्वर हमें सदबुद्धि दे कि हम माँ के स्वरूप को समझें, तदनुरूप पालन भी करें तब और मातृ दिवस का मनाना सार्थक हो।
हम सब बच्चे अपनी पूज्या माँ को बड़ी श्रद्धा से नमन करते हैं।
राज कुकरेजा/ करनाल
Twitter @Rajkukreja 16
कृपया इन विचारों को अपने स्वयं तक सीमित न करके परिजनों के साथ भी शेयर करें।

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