चिंतन के क्षण

Food for Mind and Soul (आध्यात्मिक प्रसाद)........

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rajkukreja


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देशप्रेमी बनाम देशद्रोही

Posted On: 8 Oct, 2016  
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फलित ज्योतिष (एक मिथ्या भ्रम)

Posted On: 3 Oct, 2016  
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अंध विश्वास

Posted On: 26 Sep, 2016  
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शिक्षक दिवस

Posted On: 3 Sep, 2016  
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रक्षा बंधन। – हमारा रक्षक कौन?

Posted On: 17 Aug, 2016  
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सच्चे गुरू के लक्षण (गुरू पूर्णिमा भाग २)

Posted On: 27 Jul, 2016  
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गुरू पूर्णिमा (भाग१)

Posted On: 17 Jul, 2016  
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ईश्वर न्यायकारी है।

Posted On: 1 Jul, 2016  
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मेरे धर्म पिता (Father’Day)

Posted On: 20 Jun, 2016  
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पितृ दिवस (Father’s Day )

Posted On: 18 Jun, 2016  
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आदरणीय जितेन्द्र जी नमस्ते,हमारी न्याय व्यवस्था में अनेकों दोष हो सकते हैं परन्तु ईश्वर की न्याय व्यवस्था में न तो देर है और न ही अंधेर है।कर्म फल सिद्धान्त बड़ा ही सूक्ष्म विषय है। कर्म क्रियमाण, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म होते हैं। हम किसी भी व्यक्ति के क्रियमाण कर्म जो वह कर रहा है उसे प्रत्यक्ष रूप में देखते हैं।इस काल वह कौन से कर्मो से सुख व दु:ख पा रहा है,हम नहीं जानते हैं परन्तु प्रतिदिन प्रत्यक्ष देखते हैं कि एक बालक का जन्म सम्पन्न परिवार में हो रहा है, जहाँ किसी भी प्रकार का अभाव नहीं है, दूसरी ओर बालक ऐसे परिवार में जन्म लेता है,जहाँ अभाव ही अभाव है।ऐसा केवल मनुष्य योनि में नहीं है,अन्य योनियाँ में भी देखते हैं। एक कुत्ता दुत्कारा जाता है और एक वातानुकूलित कारों में मालिक के साथ सैर करता है। ऋषि पतंजलि जाति,भोग व आयु को किए कर्मों का फल मानते हैं। जाति से उन का अभिप्राय अनेकों योनियाँ से और भोग का अभिप्राय सभी प्रकार के भोग्य साधनों से है। वैदिक दर्शन शास्त्रों और आर्ष ग्रन्थों के स्वाध्याय से इस विषय को सुगमता से समझा जा सकता है। आपने लेख पढ़ा व प्रतिक्रिया व्यक्त की, धन्यवाद।

के द्वारा: rajkukreja rajkukreja

बहुत ही विस्तृत एवं व्याख्यात्मक आलेख है यह आपका आदरणीया राज जी । ईश्वरीय न्याय, कुदरती इंसाफ़ या पोयटिक जस्टिस के बारे में मैंने भी बहुत कुछ सुना और पढ़ा है लेकिन ऐसा कोई उदाहरण मेरे जीवन में या मेरे संज्ञान में नहीं आया है । न्यायिक व्यवस्था चाहे मानवीय हो या ईश्वरीय, उसकी सार्थकता तभी है जब न्याय न केवल दिया जाए वरन समय से भी दिया जाए । अन्याय करना इसीलिए तो अत्यंत सरल होता है क्योंकि न्याय पाना अत्यंत कठिन होता है । आततायी को अन्याय करने में एक दिन या कुछ घंटे या कभी-कभी तो केवल कुछ पल ही लगते हैं जबकि पीड़ित को न्याय पाने में एक जीवन लग सकता है और उसके उपरांत भी उसका न्याय पा लेना सुनिश्चित नहीं होता । इसीलिए अन्यायी प्रायः निर्भय होते हैं क्योंकि वे न्यायिक-व्यवस्था के इस दोष तथा इससे जुड़ी पीड़ित की असहायता से भली-भांति परिचित होते हैं । ईश्वरीय न्याय भी यदि विलंब से दिया जाए तो उसे आदर्श न्याय नहीं कहा जा सकता । कहते हैं कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं । लेकिन यह देर ही तो अंधेर है । शायर की जुबान में कहा जाए तो 'ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक ।'

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

आदरणीय राज जी यह सत्य है ईश्वर न्यायकारी है ,जो प्रकृति के नियमानुसार दण्डित करता है | किन्तु धर्म क्या है इसको निश्चित करना कठिन है | भगवन राम और कृष्ण को मर्यादा मानकर भी कोई मार्ग नहीं मिलता | ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र चार वर्ण चारों का धर्म  प्रथक | अपने वर्ण के धर्म को ही धर्म माना गया | अन्य धर्मों के धर्म को देखें तो कोई मार्ग नहीं मिलता | तेरा धर्म ,मेरा धर्म सब प्रथक ही हैं | एक चींटी के भूल वश मर जाने से नरक गामी होता है दूसरा महाभारत करके भी राज भोगता है | यह सच है अत्याचार ,व्यभिचार से कमाया धन वैभव विकास दीखता तो बहुत है किन्तु मन मै शांति से दूर ही रहता है । वंश कुल का नासक होता ही है । यह इस लोक मैं ही दीख जाता है । भगवान तो भोले होते हैं । पापियों को पाप मुक्ति का आभास करा देते हैं । किंतु प्रक्रति अपने सिद्धांत से नही मुकरती है । इसके लिए मनुष्य तो मनुष्य राम ,क्रष्ण से अवतार भी कुछ नहीं कर पाते । ओम शांति शांति 

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

आदरणीय रमेश अग्रवाल जी,नमस्ते आपने ईश्वर न्यायकारी है,इस लेख पर बडी ही सुन्दर भाव अभिव्यक्ति की है।धन्यवाद कर्म फल सिद्धांत बड़ा ही सूक्ष्म विषय है।ईश्वर हमारे किए शुभ अशुभ कर्मों का फल कब,कहाँ कैसे और किस रूप में देते हैं,इसको केवल ईश्वर ही जानते हैं। मैं तो इतना जानती हूँ कि कर्म का फल हर जीव को भुक्तना ही पड़ता है।आपने जो राजनेताओं के उदाहरण दिए हैं उसके लिए दोषी हमारी न्याय व्यवस्था है और ऐसी मानसिकता वाले जो ईश्वर के न्यायकारी स्वरूप को नहीं समझते,उनका मानना है कि परमेश्वर का दण्ड जब मिलेगा तब मिलेगा,अब तो सुख भोग लें, घोर अंधकार में जीवन जी रहे हैं।इन लोगों के लिए संदेश है कि -डरो वह ईश्वर बड़ा ज़बरदस्त है उसकी अदालत से कोई नहीं बच सकता है।

के द्वारा: rajkukreja rajkukreja

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आदरणीया राज कुकरेजा जी, सादर अभिवादन! सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई! वैसे तो हम सभी थोड़े थोड़े अंध विश्वासी होते ही हैं, क्योंकि हमें संस्कार में वही सिखलाया गया और उसी के कारण हम सब ईश्वर नाम की सत्ता या उनके डर से थोड़ा संयमित रहने का प्रयास मात्र करते हैं. पर जो ईश्वर की सत्ता को दिखलावे के लिए /दूसरों को डरने के रूप में इस्तेमाल करते हैं और खुद उसे नहीं मानते उन्हें ईश्वर क्यों नहीं दण्ड देते हैं. आजकल बहुत सारे तथाकथित संत लोग गम्भीर कुकृत्य के आरोप में जेलों में बंद हैं, क्या उन्हें कभी ईश्वर का डर नहीं लगा? ईश्वर एक है सर्वव्यापी है, वेद में वर्णित हैं, फिर भी अलग अलग धर्म, सम्प्रदाय क्यों ? हिन्दू धर्म में ही अलग अलग पूजा पद्धति, अलग अलग मंदिर क्यों, अनेकों देवी देवता क्यों? क्यों हम एक ही ब्रह्म की उपासना नहीं करते? जितने भी महात्मा, ज्ञानी पुरुष हैं सभी अपनी बात को ही सही मानने/मनवाने पर आग्रही क्यों होते हैं? जैसे भगवान कृष्ण या राम ने अपने-अपने समय में अवतार लेकर प्राणियों और धर्म की रक्षा की, आज क्या वैसी स्थिति अभी नहीं आयी है? आशा है, आप मेरी आशंका का समाधान करने का प्रयास करेंगी. सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय राजकुमारी जी हम तो मथुरावासी हैं विरोध तो इस बात का है कि मूर्ति ईश्वर नहीं है।सुनने में और समझने में बड़ा ही अटपटा सा लगता है कि मूर्ति में ईश्वर है पर मूर्ति ईश्वर नहीं है।आप मूर्ति में ईशवर है या नहीं बात करते हैं हमें तो उसमें कान्हा के दर्शन होते हैं बाके बिहारी जी के मंदिर जा कर जब हम दर्शन करते हैं हमारी आँखे धन्य हो जाती हैं हमें कन्हैया में लल्ला के दर्शन होते हैं मेरी सारी शिक्षा उस दर्शन के आगे बेकार है भावना की बात हैं ' हर मथुरा वासी चाहता है ' यमुना का वंशीवट हो मोरा सांवरा निकट हो जब प्राण तन से निकलें '| हम जब बांके बिहारी के आगे दण्डवत करते हैं हमारे सब दुःख उनके हो जाते हैं बड़ी बातें समझने की हममें बुद्धि नहीं है

के द्वारा: Shobha Shobha

आदरणीया राज कुकरेजा जी ! तार्किक और विचारणीय लेख के लिए सादर अभिनन्दन ! सूर्य एक जगह पर है, किन्तु उसकी सत्ता या रोशनी सर्वत्र फैली हुई है ! भक्तों के तर्क के अनुसार भगवान का भी एक धाम है और उनकी भगवत्ता सृष्टि में सर्वत्र फैली हुई है ! शरीर में भगवान हैं, किन्तु शरीर भगवान नहीं है ! लेकिन भगवद प्राप्ति का एक माध्यम तो है ! मूर्ति भगवान नहीं, लेकिन भगवान के भीतर तो है ! वो भी तो भगवान के प्राकट्य का या अनुभव का एक माध्यम बन सकती है ! मुझे लगता है कि आर्य समाजी लोग ज्ञानार्जन अधिक करते हैं और साधना कम ! जबकि मोक्ष के लिए इसके ठीक विपरीत चलना चाहिए ! आदमी बिना किसी सोच-विचार के जितनी देर भी मौन रह ले, वो सर्वोच्च साधना है, शेष सब महज तार्किक और ज्ञान होने पर निरर्थक है ! सादर आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

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जय श्री राम राज जी बहुत अच्छी भावनाए व्यक्ति की आज देश के सामने सेक्युलर ब्रिगेड के सामने मोदी विरोध को छोड़ कोइ दूसरा अजेंडा नहीं जिस देश की रक्षा के लिए लाखो देश भक्त शहीद हो गए और सैनिक अपनी जान दे रहे कुर्सी के लालची नेता देश को बेचने के लिए भी तैयार है इसीलिए विश्वविद्यालय में राष्ट्र विरोधी कर्क्रमो का भी समर्थन के साथ आतंकवाद का भी समर्थन करते जैसा इशरत अफज़ल,याकूब के बारे में देखा गया यदि देश नहीं तो फिर हम लोग कहाँ हमारा मीडिया का एक भाग कनिया ओवैसी लोगो को इतनी पब्लिसिटी देकर हीरो बना रहा कई दिनों से इसी पर डिबेट हो रही जबकि निंदा होनी चाइये मुस्लिम नेताओ की मानसिकता देख कर दुःख होता ही लेख के लिए साधुवाद

के द्वारा: rameshagarwal rameshagarwal

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के द्वारा: achyutamkeshvam achyutamkeshvam

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कितना सुंदर, हृदयस्पर्शी और प्रेरक लेख लिखा है आपने । मन को कहीं गहरे तक छू गई आपकी बात । आज मीडिया के सभी रूप केवल बुराई और स्वार्थपरता को ही समाज के समक्ष ला रहे हैं जबकि जीवन के उन्नत मूल्यों और मनुष्यों के एक बड़े वर्ग में व्याप्त सद्गुणों और जीवन-सौन्दर्य की वे उपेक्षा कर रहे हैं । वे नहीं समझ रहे कि अल्पकालिक व्यावसायिक लाभ के लिए वे समष्टि को कितनी हानि पहुँचा रहे हैं । जीवन-मूल्य अभी लुप्त नहीं हुए हैं । संसार के सभी मानव अभी स्वार्थ और दुर्गुणों के प्रतीक नहीं बने हैं । सद्गुण अभी हैं जिन्हें अगली पीढ़ी के लिए बचाया जा सकता है । जीवन-मूल्य अभी हैं जिन्हें भविष्य के लिए सहेजा जा सकता है । कोटि-कोटि साधुवाद आपको ।

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आदरणीया मैडम, सादर अभिवादन ! मैंने ब्लॉग पर मौज़ूद आप की अब तक की समस्त पोस्ट जिज्ञासा वश देख ली है और अधिकांश पढ़ भी लिया है | आप और आप के विचारों की परिपक्क्वता, सौम्यता तथा व्यावहारिकता को आदरपूर्वक नमन करता हूँ ! "क्रियात्मक प्रयोग" में आप ने अपने उस 'अनुभूत सत्य' को प्रकट किया है, जो आज के 'दरिद्र नारायण' के बाल-गोपालों के साथ बिताए गए जीवनगत प्रौढ़ता से उत्पन्न हुआ है | ऐसे महनीय कार्य के लिए आप को शत-शत प्रणाम ! इस पोस्ट के विषय को भी सारगर्भित रूप में स्पष्ट किया गया है | ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई ! यह लेख और अन्य लेखों की अत्यंत मौलिक, अनुभव-सम्पन्न और विचारवान प्रस्तुतियों के लिए श्रद्धावनत साधुवाद !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

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